अधूरी रात, पूरा तू
शीर्षक: अधूरी रात, पूरा तू
![]() |
| अधूरी रात, पूरा तू |
आधी रात है…
घड़ी की सुइयाँ जैसे
थककर भी चलती जा रही हैं,
पर मेरी पलकों पर
नींद का कोई निशान नहीं।
खिड़की के बाहर
चाँद चुपचाप टंगा है,
जैसे किसी ने
आसमान की काली चादर पर
तेरी याद का दीप जला दिया हो।
मैं बिस्तर पर करवट बदलता हूँ,
और हर करवट में
तेरा नाम
तकिए की सिलवटों से झाँकने लगता है।
आज फिर
यह रात अधूरी है—
क्योंकि तू यहाँ नहीं है,
और मैं…
मैं पूरा होकर भी
अधूरा महसूस कर रहा हूँ।
हवा धीमे-धीमे चल रही है,
परदे हल्के-हल्के हिल रहे हैं,
जैसे कोई अनदेखा हाथ
तेरी ज़ुल्फों की याद दिला रहा हो।
याद है मुझे—
जब तू हँसती थी,
तो रातें छोटी लगती थीं,
और आज…
तेरी ख़ामोशी ने
घंटों को सदियों में बदल दिया है।
चाँद को देखता हूँ,
तो लगता है
उसकी चाँदनी भी
तेरे चेहरे की उधार ली हुई रोशनी है।
मैं उससे पूछना चाहता हूँ—
"कहीं देखा है उसे?
कहीं तेरी किरणों में
वो मुस्कान छुपी है क्या?"
पर चाँद भी आज
कुछ ज़्यादा ही ख़ामोश है,
शायद वो भी जानता है
कि इश्क़ के सवालों का
कोई सीधा जवाब नहीं होता।
रात की ख़ामोशी में
मेरी धड़कनें
कुछ ज़्यादा ही साफ़ सुनाई देती हैं।
धक… धक…
हर धड़कन जैसे
तेरा नाम दोहरा रही हो।
कभी-कभी सोचता हूँ—
क्या तुझे भी
ऐसी ही रातें जगाती हैं?
क्या तेरी पलकों पर भी
मेरी याद
नींद को रोक लेती है?
या फिर
मैं ही हूँ
जो इस मोहब्बत में
थोड़ा ज़्यादा डूब गया हूँ…
मेरे कमरे की दीवारें
आज गवाह हैं
उस खालीपन की
जो तेरे जाने के बाद
धीरे-धीरे फैलता गया।
टेबल पर रखी किताब
खुली तो है,
पर शब्द धुंधले हैं—
क्योंकि हर पन्ने पर
मुझे बस तू दिखाई देता है।
तू—
जो पास नहीं है,
पर हर जगह है।
तू—
जो साथ नहीं है,
पर हर सांस में है।
मैं खिड़की खोल देता हूँ,
ठंडी हवा अंदर आती है,
और साथ लाती है
कुछ पुरानी शामों की खुशबू।
वो शामें
जब हम साथ बैठे थे,
और वक्त
हमसे इजाज़त लेकर गुजरता था।
आज वही वक्त
बिना पूछे भाग रहा है,
और मैं
उसी जगह खड़ा हूँ
जहाँ तू मुझे छोड़ गई थी—
एक मुस्कान के साथ
और हज़ार अधूरे सवालों के साथ।
रात आधी से भी ज़्यादा बीत चुकी है,
पर नींद अब भी
मेरे दरवाज़े तक नहीं आई।
शायद उसे भी पता है
कि इस कमरे में
आज यादों की महफ़िल सजी है।
मैं आँखें बंद करता हूँ—
और तू सामने आ जाती है।
तेरी आँखें,
तेरी हँसी,
तेरा वो हल्का-सा "सुनो ना…"
सब कुछ
इतना सजीव है
कि एक पल को लगता है
तू यहीं कहीं है।
मैं हाथ बढ़ाता हूँ—
पर हवा खाली निकलती है।
और उसी पल
रात थोड़ी और अधूरी हो जाती है।
कभी-कभी
इश्क़ बड़ा अजीब होता है।
जिसे पाकर
इंसान पूरा हो जाए,
उसी के बिना
वो सबसे ज़्यादा अधूरा लगता है।
तू मेरी पूरी दुनिया है—
और देख…
मेरी दुनिया आज
कितनी खामोश पड़ी है।
ना तेरी हँसी की आहट,
ना तेरे कदमों की सरसराहट,
बस घड़ी की टिक-टिक
और दिल की बेचैनी।
चाँद अब थोड़ा ऊपर चढ़ आया है,
उसकी रोशनी
मेरे कमरे में फैल गई है।
मैं उस रोशनी में
तेरा नाम लिखता हूँ—
उंगली से, हवा में।
नाम पूरा होते-होते
आँखें भीग जाती हैं।
पता नहीं क्यों
आज ये रात
कुछ ज़्यादा ही तुझे याद दिला रही है।
शायद इसलिए
क्योंकि तन्हाई और प्रेम
आज एक ही बिस्तर पर बैठे हैं—
और मैं
उनके बीच फँसा हुआ हूँ।
तन्हाई पूछती है—
"इतना क्यों याद करता है उसे?"
मैं मुस्कुरा देता हूँ,
और प्रेम धीरे से कहता है—
"क्योंकि वो उसकी आदत बन चुकी है…"
हाँ,
तू अब सिर्फ़ याद नहीं,
आदत है।
सांसों की तरह,
धड़कनों की तरह,
उस चाँदनी की तरह
जो हर रात
बिना बुलाए चली आती है।
रात और गहरी हो गई है,
सन्नाटा और घना।
दूर कहीं
कोई कुत्ता भौंकता है,
फिर सब शांत।
जैसे पूरी दुनिया सो रही हो,
और जाग रहा हो
तो बस मेरा दिल।
मैं सोचता हूँ—
अगर तू अभी आ जाए,
बस चुपचाप,
बिना कुछ कहे…
तो शायद
ये अधूरी रात
पूरा सवेरा बन जाए।
मैंने सुना है
मोहब्बत वक्त नहीं देखती।
पर ये भी सच है
कि मोहब्बत में
रातें सबसे लंबी होती हैं।
खासकर वो रातें
जब कोई बहुत याद आए,
और वो पास ना हो।
आज वही रात है—
अधूरी…
पर तेरी याद से भरी हुई।
धीरे-धीरे
पलकें भारी होने लगी हैं,
पर नींद अब भी
पूरी तरह आई नहीं।
![]() |
| अधूरी रात, पूरा तू |
शायद वो भी
तेरा इंतज़ार कर रही है।
मैं आख़िरी बार
चाँद को देखता हूँ
और मन ही मन कहता हूँ—
"जहाँ भी हो…
खुश रहना।
पर कभी-कभी
मेरी इन अधूरी रातों में
चुपके से आ जाया करना।"
क्योंकि सच तो ये है—
मेरी हर रात अधूरी है,
पर तू…
तू हमेशा पूरा है।
और शायद
इसीलिए
मैं हर आधी रात में
तुझे ढूँढता रहता हूँ…
जब तक
सुबह की पहली किरण
मेरी आँखों पर दस्तक न दे दे—
और मैं
एक और अधूरी रात
तेरे नाम लिखकर
सो न जाऊँ।
—समाप्त—


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें